मेरे लिए हुई तू मुश्किल सवाल क्यूँ है
ऐ ज़िन्दगी तुझे अब जीना मुहाल क्यूँ है
हासिल वही हुआ है क़िस्मत में जो तिरे था
तक़दीर में नहीं जो उस का मलाल क्यूँ है
है आजिज़ी जहाँ से या बात और है कुछ
ऐ ज़िन्दगी तिरा यूँ बेहाल हाल क्यूँ है
है मौत आख़िरी में इस ज़िन्दगी का हासिल
फिर और कुछ तुझे पाने का ख़याल क्यूँ है
बे-नूर क्यूँ हुई है ऐ ज़िन्दगी बता भी
चेहरे पे आज तेरे आया ज़वाल क्यूँ है
होना है क़त्ल फिर भी आता हूँ ओर तेरी
ऐ ज़ीस्त क़ातिलाना तेरा जमाल क्यूँ है
क्यूँ दफ़्न हो रही है याँ ज़िन्दगी क़फ़स में
इक क़ैद ज़ीस्त की मुश्किल देख-भाल क्यूँ है
रूदाद-ए-इश्क़ पढ़ कर उठता ख़याल दिल में
आसान हिज्र गर तो मुश्किल विसाल क्यूँ है
शमशीर नफ़रतों की ख़ामोश थी अगर तो
दीवार-ओ-दर मुहब्बत का आज लाल क्यूँ है
हर दम यहाँ रहा जो ख़िदमत में सब की हाज़िर
मुफ़्लिस वो आज सब पे भारी वबाल क्यूँ है
लड़ना ही है तो लड़ तू मुफ़्लिस के हक़ की ख़ातिर
पत्थर-दिलों की ख़ातिर तुझ में उबाल क्यूँ है
गुमनाम फिर रही है दुनिया में क्यूँ सदाक़त
मशहूर क्यूँ हैं झूटे बातिल मिसाल क्यूँ है
आईन गर सही तो मुंसिफ़ अगर सही तो
क्यूँ बेगुनह क़फ़स में मुजरिम बहाल क्यूँ है
#अमित_अब्र
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