Saturday, 29 October 2022

झील आँखों में समंदर रंज-ओ-ग़म का इक बहे

झील आँखों में समंदर रंज-ओ-ग़म का इक बहे
क़ैद अपने साहिलों में झील ग़म किस से कहे

एक दिल है लाख ग़म हैं और दौर-ए-हिज्र है
ग़म सहे कितने मगर दिल दर्द-ए-दिल कैसे सहे

दौर-ए-नफ़रत आज का भी है गुज़िश्ता दौर सा
बेक़ुसूरों के ख़ुदाया आशियाने फिर ढहे 

जल रहे हैं रूह-ओ-जाँ अब याद की इक आग में 
यार आ भी जा कि कब तक जाँ झुलसती ही रहे

क्या बताऊँ मैं कि कैसी थी मसाफ़त इश्क़ की 
गाह चलता था सफ़र में और रुकता था गहे

#अमित_अब्र 

No comments:

Post a Comment