झील आँखों में समंदर रंज-ओ-ग़म का इक बहे
क़ैद अपने साहिलों में झील ग़म किस से कहे
एक दिल है लाख ग़म हैं और दौर-ए-हिज्र है
ग़म सहे कितने मगर दिल दर्द-ए-दिल कैसे सहे
दौर-ए-नफ़रत आज का भी है गुज़िश्ता दौर सा
बेक़ुसूरों के ख़ुदाया आशियाने फिर ढहे
जल रहे हैं रूह-ओ-जाँ अब याद की इक आग में
यार आ भी जा कि कब तक जाँ झुलसती ही रहे
क्या बताऊँ मैं कि कैसी थी मसाफ़त इश्क़ की
गाह चलता था सफ़र में और रुकता था गहे
#अमित_अब्र
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