सँवर जाती है जब ये ज़िन्दगी उल्फ़त की राहों में
ज़माना क्यूँ गिने है फिर मुहब्बत को गुनाहों में
वही चेहरा वही आँखें वही आरिज़ वही ज़ुल्फ़ें
वही इक शख़्स बसता है हमारी इन निगाहों में
कभी झुमका कभी पायल कभी नथिया कभी बिंदी
कभी देखूँ तिलिस्मी से वो दो तावीज़ बाहों में
अदालत नफ़रतों की फिर न दे पाई सज़ा कोई
मुक़दमे में मुहब्बत जब रही शामिल गवाहों में
मुहब्बत से पुकारो तो ख़ुदा ख़ुद में नज़र आए
ज़रूरी कब रहा जाना शिवालों ईदगाहों में
ज़माना और भी शफ़्फ़ाफ़ होता है मुहब्बत में
निखरता और है इंसाँ मुहब्बत की पनाहों में
मुहब्बत से भरे दिल को सताया जब ज़माने ने
ज़माना आप जल उट्ठा दीवाने दिल की आहों में
#अमित_अब्र
14-09-2022
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