Saturday, 29 October 2022

बे-क़रारी इश्क़ में है बे-क़रारी प्यार में है

बे-क़रारी इश्क़ में है बे-क़रारी प्यार में है
बे-क़रारी हिज्र में है और वस्ल-ए-यार में है

बे-क़रारी में मुहब्बत आज टहली जो गली में 
बे-क़रारी है गली में, कूचा-ए-दिलदार में है

मौत होगी या कि हासिल इश्क़ होगा यार का अब
बे-क़रारी बे-क़रारी इश्क़ के बीमार में है

आज आएगा नज़र वो या कि पर्दे में रहेगा    
इक अजब सी बे-क़रारी हसरत-ए-दीदार में है

है इलाज-ए-बे-क़रारी कह दूँ उन से हाल-ए-दिल 
सोचना आसाँ मगर मुश्किल बहुत इज़हार में है

उन के आने की ख़बर से बे-क़रारी आस्ताँ में
बेक़रारी आँगन-ओ-बाम-ओ-दर-ओ-दीवार में है

आ रहा था हम से मिलने पर न आया अब तलक वो
बे-क़रारी और ख़्याल-ए-यार भी अफ़्कार में है

#अमित_अब्र 


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