Saturday, 29 October 2022

कल शब जो बढ़ा आलम-ए-रानाई ज़रा और

कल शब जो बढ़ा आलम-ए-रानाई ज़रा और

छायी दिल-ए-मायूस पे तन्हाई ज़रा और


होता न अँधेरा मिरी तक़दीर पे क़ाबिज़ 

होती जो उजाले से शनासाई ज़रा और


जल्दी में था सूरज मिरा बिन शाम ढला आज

वर्ना अभी चलती मिरी परछाई ज़रा और 


बदनाम मिरी ज़ीस्त अभी कम थी भला क्या 

जो मौत ने शोहरत मुझे दिलवाई ज़रा और


मानी जो नहीं बात सितमगर की तो यारो

शमशीर-ए-सितमगर मिरी ओर आई ज़रा और


ज्यों ज्यों बढ़ा है ज़ुल्म-ओ-सितम जिस्म-ओ-ज़ुबाँ पर 

हिम्मत मेरी इस रूह पे गहराई ज़रा और


मसले पे जिरह बिन ही गुनहगार हुए हम

बच जाते अगर चलती जो सुनवाई ज़रा और 


-अमित सिंह

30-4-2018





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