Saturday, 29 October 2022

ख़ुश-नसीबी भूल कर भी उस के घर आती नहीं

ख़ुश-नसीबी भूल कर भी उस के घर आती नहीं
घर से मुफ़्लिस के कभी अच्छी ख़बर आती नहीं

आसमाँ से बाँट कर आती ज़मीं पे क्या कि जो
रौशनी ये एक जैसी सब के दर आती नहीं  

क्या कभी तुम ने सुनी मुफ़्लिस के मरने की ख़बर
मौत होती है मगर हम तक ख़बर आती नहीं

बाद हर शब इक सहर आती शहर में रोज़ है 
बस्तियों में क्यूँ वही लेकिन सहर आती नहीं 

ले रही है जाँ ग़रीबों की ग़रीबी दिन-ब-दिन
मुफ़्लिसी फिर भी हमें क़ातिल नज़र आती नहीं 

क्या बदल ली वक़्त ने करवट बला की ओर है
ख़ुश-नसीबी भूलकर भी जो इधर आती नहीं 

आदमी सा हो चला क्या आज तू भी ऐ ख़ुदा
आज क्यूँ मजबूर तक तेरी मेहर आती नहीं

#अमित_अब्र 

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