ज़ेहन में तिरी याद के क़ाफ़िले थे
तक़ाज़ा-ए-उल्फ़त में तुझ से मिले थे
नज़र से नज़र कर रही गुफ़्तुगू थी
थी मिज़्गाँ खुली लब हमारे सिले थे
हक़ीक़त की दुनिया तो कांटों भरी थी
मगर ख़्वाब में फूल फिर भी खिले थे
विसाल-ए-सनम थी वजह हिज्र की, सो
किसी से न शिकवे न कोई गिले थे
कभी था मिलन तो कभी थी जुदाई
रह-ए-इश्क़ में याँ यही सिलसिले थे
#अमित_अब्र
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