हाल पे बस्ती के शहर कब है परेशान हुआ
देख के वीरान यहाँ कौन है वीरान हुआ
था आग़ोश में पानी पर रहने दिया जलने
सहरा पे समंदर याँ कब है मेहरबान हुआ
मुंसिफ़ बदल गये पर सुलझा नहीं मुक़दमा
सच हर बार आग में झूट की है श्मशान हुआ
बे-ख़ौफ़ हवाएँ हैं आज ज़मींदोज़ हुईं
जब्र में तूफ़ान-ए-तहरीक बयाबान हुआ
ये कौन है जो हम को तक़्सीम कर गया है
क्या है जो फ़ासला हमारे दरमियान हुआ
ज़ज्ब किया सूरज मिरा ऊँची इमारतों ने
ज़ुल्मत मेरे घर का साज-ओ-सामान हुआ
मिज़ाज यूँ है बदला इंसानी फ़ितरतों ने
ग़म ही किसी का अब किसी का इत्मीनान हुआ
कर सकते थे जहाँ क़ैद मुट्ठी में रौशनी को
जंग अँधेरे से वहीं आज घमासान हुआ
#अमित_अब्र
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