दिल-ए-मजरूह की फिर आरज़ू क्या, जुस्तुजू क्या है
मुसलसल कर्ब है तो फ़र्क क्या कि रू-ब-रू क्या है
नहीं हालात वश में हैं, नहीं तक़दीर पे क़ाबू
बता ऐ ज़िन्दगी अब और बाक़ी गुफ़्तुगू क्या है
बुरी तक़दीर भी मेरी, बुरी तक़रीर भी मेरी
परेशानी-ओ-ग़म के बाद बाक़ी कू-ब-कू क्या है
गया लेकर तुम्हारे ख़्वाब भी जब साथ वो अपने
दिल-ए-मायूस बाक़ी और तेरी आरज़ू क्या है
हिफ़ाज़त के लिए दर-दर भटकने जब लगे अस्मत
हुकूमत की जहाँ में फिर बताओ आबरू क्या है
हिदायत लाख हो ख़ामोश रहने की मगर फिर भी
जफ़ा पर जो न उबले तो भला फिर वो लहू क्या है
इबादत में यक़ीं तो इश्क़ से इन्कार क्यूँ तुम को
मुहब्बत गर नही तो फिर ज़माने में ख़ुदा के हू-ब-हू क्या है
#अमित_अब्र
1222 1222 1222 1222
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दिल-ए-मजरूह= घायल दिल
आरज़ू= इच्छा
जुस्तजू= तलाश
कर्ब= दर्द
कू-ब-कू= everywhere हर जगह
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