Wednesday, 24 November 2021

इक शख़्स को हमारा जो इंतिज़ार कम है

इक शख़्स को हमारा जो इंतिज़ार कम है
ग़मगीन है मगर दिल अब बे-क़रार कम है

कैसे रखूँ उसे अपने दर्द के मुक़ाबिल
है साथ वो मगर उस पे इख़्तियार कम है

होकर जुदा सनम से ज़िन्दा अभी तलक हूँ
अब मर्ग-ए-हिज्र पर हम को ए'तिबार कम है

शामिल हुजूम मे हूँ लेकिन बिना तुम्हारे
बर्बाद ज़िंदगी पर दार-ओ-मदार कम है

अब नब्ज़ डूबती है याँ याद में तुम्हारी
ग़मगीन एक दिल में रंज-ओ-गुबार कम है

दूरी-ए-यार का ग़म मंजूर है मगर गर
है यार बे-ख़बर तो ग़म शानदार कम है

यूँ तो बहुत हसीं है मौसम तिरे शहर का
लेकिन बग़ैर तेरे कुछ ख़ुश-गवार कम है

कुछ इस तरह ख़िज़ाँ ने वीराँ किया चमन को
अब शाख पर गुलों का नायाब बार कम है

शिकवा है ज़ीस्त से या इन्कार है तुम्हारा 
क्यूँ राह-ए-ज़िन्दगी का मुझ को ख़ुमार कम है

ख़ुद में बिखर रहा हूँ जाने के बाद उन के
धड़कन सिमट रही है दिल का दयार कम है

किस बात का गिला फिर साये से ज़ुल्मतों के
सूरज ही जब हमारा हम पे निसार कम है

#अमित_अब्र 


221  2122  221  2122

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