सितारा है घटा है या हसीं इक ख़्वाब है क्या है
चमकता सा लिबास-ए-शब में वो महताब है क्या है
घनी ज़ुल्फ़ें क़मर रू सुर्ख़ लब तो झील आँखें हैं
फ़क़त है हुस्न ही या हुस्न का सैलाब है क्या है
कि अब तब्दील होती है चमकते चाँद में उल्फ़त
जमाल-ए-यार है ख़ुर्शीद या शब-ताब है क्या है
हँसी पर यार के होती अँधेरी रात भी रौशन
सितारा है कि जुग्नू है कि इक महताब है क्या है
उभरता डूबता है इश्क़ उस की मुस्कुराहट में
समंदर हुस्न का है हुस्न का गिर्दाब है क्या है
फ़ज़ा रंगीन होवे है अगर मौजूद जो वो हो
हुआ इक गुल हसीं वो या हुआ सुर्ख़ाब है क्या है
तुम्हारी जुस्तुजू में ऐ मुहब्बत बे-क़रारी क्यूँ
दिल-ए-मजरूह-ए-उल्फ़त या दिल-ए-बेताब है क्या है
#अमित_अब्र
1222 1222 1222 1222
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