कभी भँवर कभी किनारे पे लाती है ज़िन्दगी
क़दम क़दम पर सब्र आज़माती है ज़िन्दगी
बच्चों की ख़ातिर हँसते हैं हम ग़मगीन
अक्सर यूँ भी हमें सताती है ज़िन्दगी
कहता नहीं किसी से अब दिल ग़म-ए-मुहब्बत
ग़म चुपचाप अश्क़ में बहाती है ज़िन्दगी
जब भी सितम-ज़दा दिल होता है इश्क़ में
कई सवाल इश्क़ पे उठाती है ज़िन्दगी
हूँ आज जाँ-ब-लब जो बाद-ए-यार तो फिर
क्यूँकर महबूब से मिलाती है ज़िन्दगी
राह-ए-सफ़र-ए-याद-ए-यार में अक्सर अब
जाकर दूर तलक लौट आती है ज़िन्दगी
आती है जब तासीर-ए-मुहब्बत में
भूल अपना भी वजूद जाती है ज़िन्दगी
ख़्वाब उस का आता है फिर नींद टूट जाती है
पल में हँसाती पल में रुलाती है ज़िन्दगी
#अमित_अब्र
22 22 22 22 22 2=22
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