मुझे मेरा भारत अखण्ड चाहिए
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खण्ड खण्ड हो रहा है भारत
मुझे मेरा भारत अखण्ड चाहिए
करता है भस्म अरि को जो अग्निकुण्ड
उस अग्निकुण्ड में प्रज्वलित अनल और प्रचण्ड चाहिए
बहुत दिनो रह गया अशोक महान
अब कुछ काल के लिए पुराना अशोक चण्ड चाहिए
लंका जले ज्वाला में जिसके क्रोध की
फिर से ऐसा एक वानर उद्दंड चाहिए
हो गगनभेदी डमरू निनाद फिर
फिर से रिपुदमन को रुद्र का उग्र एक ताण्डव चाहिए
आहूत है हर कोई , आहुति दे हर कोई
अब हर हाल में हर भाल अरि का खण्ड खण्ड चाहिए
खण्ड खण्ड हो रहा है भारत
मुझे मेरा भारत अखण्ड चाहिए
-डा.अमित कुमार सिंह ‘अब्र’
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