Sunday, 5 August 2018

उस्लूब-ए-ख़ास-ओ-नाज़-ओ-नायाब तुम हुए हो

उस्लूब-ए-ख़ास-ओ-नाज़-ओ-नायाब तुम हुए हो
बे-नूर आसमाँ का महताब तुम हुए हो

ताबीर ही से जिसकी शब खुशनुमा हुई है
बे-हद हसीन-ओ-दिलकश वो ख़्वाब तुम हुए हो 

साया-ए-रंज-ओ-ग़म भी काफ़ूर हो गये हैं
वीरान ज़िन्दगी में शादाब तुम हुए हो

दरिया में डूब कर भी प्यासे ही हम रहे हैं
जो तिश्नगी मिटाये वो आब तुम हुए हो

सुकून-ए-अंजुमन है महफ़िल में तेरा आना
बे-ताब धड़कनों की अब ताब तुम हुए हो

लाला-ओ-गुल खिले हैं आने से याँ तुम्हारे
गुलशन के आसमाँ पर सुर्ख़ाब तुम हुए हो

डूबे गये तुम्हारे दरिया-ए-हुस्न में हम
बे-हद हसीन-ओ-ज़ालिम गिर्दाब तुम हुए हो

#अमित_अब्र

221  2122  221  2122
______________________________________
उस्लूब-ए-ख़ास=special
ताबीर=interpretation  (of dreams)
शादाब=greenery, हरियाली
तिश्नगी=प्यास
लाला-ओ-गुल=tulip & rose or flowers
सुर्खाब=a colourful bird
गिर्दाब=भँवर

2 comments:

  1. दरिया में डूब कर भी प्यासे ही हम रहे हैं
    जो तिश्नगी मिटाये वो आब तुम हुए हो।
    वाह ! सुंदर शब्द-प्रवाह ,अंत तक पाठक को बांध कर रखने वाली उम्दा गज़ल ।

    ReplyDelete
  2. बहुत-बहुत शुक्रिया आपका,सर
    हौसलाअफ़ज़ाई के लिए ह्रदय से आभार आपका 🙏🌷

    ReplyDelete