Saturday, 29 October 2022

हो कर गई मुहब्बत रुस्वा दर-ए-शहर से

हो कर गई मुहब्बत रुस्वा दर-ए-शहर से 

देखा किए सभी पर निकला न कोई घर से 


दिल है बुझा बुझा सा उस के बग़ैर मेरा
घर में भी हो गई है इक शाम अब सहर से


हर दर्द के सफ़र में दिलबर इलाज-ए-ग़म है
कटता नहीं हमारा नाला-ए-दिल ज़हर से


क्या दैर क्या हरम क्या दर शैख-ओ-बरहमन का
जाते नहीं कहीं हम अब यार के शहर से


कुछ यूँ गुज़र रही है इस दौर में मुहब्बत
अब बह रहा है इस में ख़ूँ आप चश्म-ए-तर से


दीद-ए-सनम की ख़ातिर भूला हूँ दर ख़ुदा का
मैं हो गया हूँ काफ़िर दुनिया में इस ख़बर से


इक बार तुम मिले थे इक भीड़ में कहीं पर
तस्वीर अब तुम्हारी हटती नहीं नज़र से


ख़्वाब-ए-फ़िराक़-ए-दिलबर मंज़ूर अब नहीं है
कह दो निगाह-ए-दिन से और रात के जिगर से


पैहम यहाँ चले तो हासिल हुआ ठिकाना
मंज़िल के वास्ते हम हारे नहीं सफ़र से


यायावरी हमारी कर दे न दूर उन को
कूचा-ए-यार घर है इस बात की फ़िकर से


रौशन न था दिनों से माना मकान उस का 

सोया नहीं मुसलसल क्यूँ मैं कई पहर से 


#अमित_अब्र

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